जीमूतवाहनव्रत कथा

मैथिली भाषामे जितिया व्रत कथा



शम्पायन कहलन्हि

रम्य कैलाश शिखर पर श्रीपार्वती शिवके कहलनि हे महेश्वर ! हम जे सुन’ चाहैत छी से अहाँ कहू ।। 1 ।।

श्रीपार्वती बजलीह-

कोन पूजा, तपस्या वा व्रत सँ स्त्री सौभाग्यवती तथा चीरजीवि सन्तति वाली होइत छथि से कहू ।। 2 ।।

श्रीशङ्कर बजलाह-

आश्विन कृष्ण पक्षमे जे अष्टमी तिथि होइछ, ताहिमे पुत्रक चिरजीवित्व कामनावाली हर्षयुक्ता शालिवाहन राजाक पुत्र जीमूतवाहनक पूजा करैत छथि।

कुशमय जीमूतवाहन बनाय कलश पर राखि ।। 3-4।।

नाना प्रकारक पीयर लाल आदि फूल सँ तथा बाङक काठीमे बान्हल नाना रंगक पताका आदि सँ पूजास्थानके कृत्रिम पोखरिक समीप सुशोभित कय ओही ठाम पाकड़िक डारि जलक समीप राखि सिन्दूर सँ लाल माथ वाली गोबर माटि सँ बनल चिल्ली डारि पर, सियारनी नीचामे राखि ।। 5-7।।

ब्राह्मण रूपी जीमूतवाहनके यथाशक्ति पूजा कय जे श्रेष्ठ स्त्री एहि कथाके सुनैत छथि ।। 8 ।।

तथा उपवास करैत छथि से पूर्ण मनोरथ होइत छथि। वंश वृद्धि हेतु बाँसक पात सँ पूजा क’रक चाही ।। 9 ।।

समुद्रक समीप कल्याण देनिहार नर्मदा नदीक समीप दक्षिण देशमे कञ्चनावती नगरीमे वास केनिहार सकल राजसमूहक जितिनिहार दोसर अर्जुन समान सभैक शासक मलयकेतु नाम सँ प्रसिद्ध नाना प्रकारक पैदल, रथ, हाथी, घोड़ा तथा नाना तरहक हथियार युक्त राजा छलाह।

नर्मदाके पश्चिम तीरमे बाहूट्टार नामक मरुस्थल अछि ।। 10-12 ।।

ताहि ठाम महान भयंकर धोधरि युक्त पाकड़िक वृक्ष अछि, ओहि वृक्षक नीचाँ धोधरिमे एक सियारनी तथा एक चिल्ली वृक्षक उपर डारि पर चिरकाल सँ परस्पर मैत्री युक्त वास करैत छल। आश्विन कृष्ण अष्टमीमे एहि नगरक स्त्री वर्ग शालिवाहनक पुत्र जीमूतवाहनक पुत्रजीवनक कामना वाली सहर्ष पूजा कय तथा कथा सुनि अपना अपना घर जाइत छलीह।

लोकक ई आचरण देखि सियारनी तथा चिल्ली ईव्रत कर’ लागलि ।। 13-16।।

दैववश एक समय एही अष्टमीक सन्ध्याकाल चिरकाल सँ एहि नगरमे बसनिहार दन्तासेठक ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय भेलाह ।। 17 ।।

हुनक बान्धव गण शवके नर्मदाक तीरमे अग्नि संस्कार कय तिलाञ्जलि दय अपना अपना घर गेलाह ।। 18 ।। 

तखन निशीथमे जखन मेघक गर्जना सहित वर्षा होइत छल भूख सँ अति व्याकुल सियारनी सँ चिल्ली कहलि गेलि ।। 19 ।।

हे सखि चिल्ली ! तुँ जागलि छऽ, चिल्ली कहलनि हे सखि सियारनि ! जगैत छी, एहि प्रकारे बारं बार सियारनी सँ पूछलि गेला पर विस्मय युक्त चिल्ली सोचलन्हि जे की हेतु हम बारम्बार पूछलि जायत छी किन्तु आगाँ किछु सियारनी नहि बजैछ। अतः चुप भय एकर की तात्पर्य छैक तकर परीक्षा करी ई निश्चय कय चिल्ली पुनः पुछ्लहूँ पर चुप भ’ गेलीह ।। 20 -22।।

चुप भेला पर चिल्लीके सुतलि जानि धोधरि सँ बाहर आयल सियारनी नर्मदाक तीर जाय मुहँ सँ जल आनलक ।। 23 ।।

ओहि सँ चिताक अग्निके मिझाय यतेच्छ मुर्दाक मांस खाय खण्ड खण्ड कय शेष अपना धोधरिमे आनलक ।। 24 ।।

एहि सियारनीक सकल समाचार जानि सियारनीक क्षुद्र स्वाभाव बुझि चिल्ली उदास रहलीह। प्रातः कालमे सियारानी चिल्लीके देख कहलनि ।। 25 ।।

हे चिल्ली ! पारणाक चर्चा तोरा सँ कियैक नहि कयल जाइछ। सियारनीक ररातुक चरित स्मरण कय उदासीन भावें चिल्ली बजलीह। हे सखि श्रृगालि ! तूँ पारणा करऽ हम स्त्री वर्ग सँ देल वस्तु सँ पारणा करब ।। 26-27 ।।

ई सुनि सियारानी धोधरिमे राखल मांस सँ यथेच्छ मिथ्या पारणा कयलन्हि ।। 28 ।। 

चिल्ली स्त्री वर्ग सँ देल वस्तु सँ पारणा कयलन्हि। तखन कालवश चिल्ली सियारनी दुनू प्रयागराज गेलीह ।। 29 ।।

चिल्ली मन्त्रिश्रेष्ठ बुद्धिसेनक पत्नी होई एहि कामना सँ प्राणत्याग केलन्हि। तथा सियारनी महाराज मलयकेतुक पत्नी हेवाक कमाना सँ प्राणत्याग केलन्हि ।। 30-32।।

प्रयागमे मृत्युजन्य पूण्य सँ दुनू वेदज्ञ ब्राह्मण भास्करक घर जन्म लेलन्हि ।। 33 ।।

जेठि शीलवती नामक तथा छोटि कर्पूरावती नाम सँ ख्यात भेलीह। गुण सँ नागकन्या तथा देवकन्या समान जेठ शीलावती बुद्धि सेनक तथा छोटि कर्पूरावती पृथ्वीपति मलयकेतुक स्त्री भय कृत्य कृत्य भेलीह ।। 34-35 ।।

तकर बाद शीलावती पूर्वजन्मकृत व्रतक प्रभाव सँ सात पुत्रके उत्पन्न केलन्हि। क्रमशः दीर्घायु पुत्र सँ पूर्ण मनोरथ वाली प्रसन्न भेलीह ।। 36 ।।

रानी कर्पूरावती मृतवत्सा दोष सँ दुःखिता प्रतिदिन क्षीण होइत संसार सँ विरक्त भेलीह।। 37।।

बहुतदिन बीतला पर कामदेव स्वरूप सुन्दर राजाक सेवा हेतु आयल शीलवतीके सातो पुत्रके बुद्धिमे बृहस्पति, बलमे कार्तिकेय सदृश अपन द्वेष्य स्त्रीक सात सहोदरके देखि ।। 38-39।।

वज्र सँ आहत भँ कय पृथ्वी पर खसलीह। पुनः उठि कर्पूरावती बड़कष्ट कहैत अपना पलङ्गपर जाय केवाड़ बन्द कय सुति रहलीह। राजा अपन नौकरके पूछलन्हि महादेवी रानी कतय गेलीह नहि दृष्टिगोचर होइत छथि ।। 40-41।।

एहि घरमे राजमाता सूतलि छथि ई नौकर सँ सुनि राजा रानीक घरमे प्रवेश केलन्हि ।। 42 ।।

तथा रानीके कहलन्हि हे प्रियभाषिणी प्रिये ! की हेतु निर्जन घरमे सुतल छी। उठू हमरा की हेतु कष्ट दैत छी ।। 43।।


रानी कहलन्हि सुख सँ सुतल छी किन्तु राजा ताहि सँ सन्तुष्ट नहि भेलाह। राजा सँ बार बार पूछला पर राजाके कहलन्हि ।। 44 ।।


हे नाथ !  हम तखन उठव यदि अहाँ हम जे किछु कहब से अहाँ करी। नहि तँ जाउ नहि बाजू हम सूतलि छी ।। 45 ।।


एहि तरहे कहल राजा अहाँक कहल करब ई कहलन्हि। हठात् उठि कर्पूरावती कहलन्हि हे राजन ! सत्य करू ।। 46 ।।


ई सुनि राजा स्त्रीक उक्त सत्य केलन्हि। तखन उठि कर्पूरावती राजाके आलिङ्गन कय कहलन्हि ।। 47 ।।


यदि हमर जीवन चाहैत छी तँ हमरा बहिनिक सातो पुत्रके शिर काटि हमरा दिय ।। 48 ।।


ई सुनि राजा मलयकेतु दुहु कान छुवैत स्त्रीके कहलन्हि बहिनिक पुत्र अपने पुत्र थिका तखन अहाँ एहन किएक बजैत छी ।। 49 ।।


बहिनिक पुत्रके मारबाक हठ रानी नहि छोड़लन्हि। सत्यके भय सँ रानीक अति कठोर वचनके स्वीकार केलन्हि ।। 50 ।।

रानी राजाक वचन सत्य बुझि जीमूतवाहनके धूमधाम सँ पूजा कय उत्सव मनौलन्हि ।। 51 ।।


तकराबाद महारज मलयकेतु मन्त्रीक सातो पुत्रके शिर कटबाक हेतु अपना द्वार पर एहन यन्त्र लगवौलन्हि जाहि सँ ओहि दय गेनिहारक शिरकटि जाय। सयोंग वश राजसेवाक इच्छा सँ जाइत एहि सातोक शिर काटि स्त्रीके दय मनमे परम दुःखी भेलाह ।। 52-53 ।।


सातो शिर देखि कर्पूरावती हर्षित भेलीह। सात बाँसक डालीमे सातो शिर राखि सुन्दर वस्त्र सँ झाँपि दासीक द्वारा अपन बहिनि शीलावतीके बैन पठौलन्हि।  तखन शीलावती सातो पुतौहके एक एक डाली पठाय अपना अपना पतिके भोजन करायब ई कहलन्हि ।। 54-55 ।।


तखन शीलावतीक पुत्रक मृत्यु समाचार जीमूतवाहन जानि रानी सँ कयल सेवा ग्रहण कय शीघ्र उठि अपन घर चललाह। द्वार पर आबि खत्तामे पड़ल कबन्धके (शिर रहित शारीर) देखि, बुद्धिसेनक पुत्रक ई कबन्ध थीक से जानि चिरकाल तक चिन्ता केलन्हि। एहि सातोक माता शीलावती सँ हम अति उपासित छी अतः दया युक्त माटिक शिर बनाय कबन्धमे जोड़ि अमृत सीँचि सातो पुत्रके जियौलन्हि ।। 56-59।।


कर्पूरावती डालीमे जे सातो शिरशीलावतीके पठौलन्हि से सातो ताड़क फल भय गेल ।। 60 ।।


जीमूतवाहन एहि प्रकारे जियाय अपना घर गेलाह।  तखन जीमूतवाहनक प्रभाव सँ जिआओल सातो पुत्र हृष्ट पुष्ट आनन्द युक्त जेना सूतल लोक उठैछ तेना सहसा उठि अपना अपना घोड़ा पर चढ़ि अपना घर चललाह ।। 61-62 ।। 


घर पहुँचि स्नान कय अपना अपना घर गेलाह। एहि सातोके अपना अपना स्त्री सँ एक एक डाली देल गेल ।। 63 ।।


जीमूतवाहनक प्रभाव सँ फल बनल सातो मस्तक इच्छानुसार खायल गेल। कर्पूरावती रानी मन्त्री बुद्धिसेनक घरमे पुत्रक समाचार जानबाक हेतु कान पथने छलीह ।। 64-65 ।।


किन्तु कानव नहि सुनि दासीके पठौलन्हि जे ओहि घरमे लोक कानैत अछि वा नहि ।। 66 ।।


दासी ओहि ठाम सँ फिरि आवि कहलक जे ओहिठाम सभ लोक हर्षयुक्त अछि तथा नाच गान भय रहल छैक ।। 67 ।।


ई सुनि कर्पूरावती अत्यन्त दुःखिता भेलीह। दीर्घ सांस लय क्रुद्धा सर्पिणी सदृश्य बार बार सांस लय मूर्छित भेलीह ।। 68 ।।


तखन प्रातःकाल राजाक सेवा हेतु पुनः आयल शीलावतीक पुत्रके देखि राजाके कहलन्हि ।। 69।।


हे राजन! की अहाँ सात चोरक शिर काटि हमरा दऽ परतारल अन्यथा ई सातो पुनः सेवा हेतु कोना अयलाह। ई सुनि राजा अति आश्चर्य युक्त नीचाँ सँ मुँह कयने किछु नहि बजलाह ।। 70-71 ।।


हे देवी! अहाँक सोझाँ सातो शिर कटाओल तखन अहाँ ई कोना कहैत छी ।। 72 ।।


हमरो एहि सातोके देखि आश्चर्य लागल एकर ई कारण बुझि पड़ैछ जे पूर्व जन्ममे अहाँक बहिनि सँ एहेन कोनो व्रत कयलगेल जकरा प्रभाव सँ एहि जन्ममे जीवैत सात पुत्रवाली सुखी छथि। किन्तु अहाँ सँ ओ व्रत नहि कएल गेल अथवा उपेक्षा कएल गेल ।। 73-74।।

ताहि सँ अहाँ पुत्रशोक सँ पीड़ित छी। ई राजाक वचन सुनि उदास जेकाँ किछु नहि बजलीह ।। 75।।


तखन मन्त्रिप्रवर बुद्धिमान् बुद्धिसेन कर्पूरावती सँ  घातित पुत्रक जीवित-वृतान्त स्वयं निज पत्नी ‘शीलावती’के कहलन्हि ।। 76।।


तकर बाद वर्ष बीतला पर पुनः जीमूतवाहन व्रतक दिन आयल पर पारणाक दिन रानी कर्पूरावती दासीक द्वारा शीलावतीके ई संवाद पठौलन्हि जे बहिनि! हम आइ अहीँक संग पारणा करब ।। 77।।


दासीक एहि बातके शीलावती आदर नहि कय, महामन्त्रीक स्त्री किछु व्यङ्ग शब्दे कहलन्हि। हे दासी ! महारानीक संग पारणा गरीबक उचित नहि ।। 78-79 ।।

ई वचन दासीक मुहेँ सुनि क्षुब्ध हृदयवाली रानी महफामे सवार भय शीलावतीक घर गेलीह ।। 80।।

तखन शीलावती ठण्डा जल सँ महरानीक पैर धोय अपना आँचर सँ पोछि सुन्दर धीरे-धीरे चामर डोलवैत कुशल पूछलन्हि । तखन रानी शीलावती बहिनिके कहलन्हि हे बहिनि ! पारणाक समय बीतल जा रहल अछि हमरा संग पारणा करू। तखन शीलावती पूर्णरूपेण विचारि पुनः पुनः कहलन्हि ।। 81-83 ।।

हे कर्पूरावती ! अहाँ राज्य भोग करू किन्तु हमरा संग परणाक हठ नहि करू, पुनः रानी बारंबार बहिनिके कहलन्हि, अहाँक संगहि पारणा करब अन्यथा हम  पारणा नहि करब, जखन बेर-बेर शीलावती सँ बुझौला पर रानी कर्पूरावती हठ नहि छोड़लन्हि ।। 84-85।।

तखन शीलावती पारणाक वस्तु लय कर्पूरावतीक हाथ धय नर्मदा नदीक तीर जाय, कर्पूरावतीके हृदय लगाय कहलन्हि। अहाँ राज्य भोग करू ।। 86-87 ।।

किन्तु रानी हठनहि छोड़ि संगहि पारणा कय राज्य भोग करब ई शीलावतीके कहलन्हि । तखन शीलावती तथा रानी नमर्दामे स्नान कय, शीलावती पञ्चदेवता तथा दिक्पाल इन्द्र आदिके प्रणाम कय रानीके कहलन्हि। की पूर्व जन्मक समाचार तूँ सियारनी छलीह हम चिल्ली पक्षी छलौहुँ । ई नर्मदा नदी तथा यैह बाहूट्टार मरुस्थल ।। 88-90।।

वैह सघन महान् पाकड़िक उपर हमर खोता छल ।। 91 ।।

एक समय नगर स्त्रीक संग हमरा दुनू सँ संगहि व्रत कएल गेल। एही नदीक कात पाकड़िक नीचाँ जीमूतवाहनक पूजन विधिवत् कय कथा सुनि सभ स्त्री अपना अपना घर गेलीह। हमहूँ दूनू अपना वासस्थान गेलहुँ। ओहि सन्ध्याकाल कोनो बनियाँ मुइल तकरा नदी किनारमे जराय बन्धुवर्ग अपना अपना घर गेलाह। तखन आधा रात्रि बीतला पर सियारनी रूपा तूँ हमरा पुछलाह ।। 92-94 ।।

हे चिल्ली ! जगैत छह। हम हे सखि ! जगैत छी की कहऽ। बारंबार तोरा सँ एहिना कहल गेल तथा हमरा सँ ओहिना उत्तर कहल गेल ।। 95 ।। 

तखन तोहर चरित बुझवाक हेतु निन्दक बहाना कय उत्तर देव छोड़ि देल तखन तूँ हमरा सूतलि जानि धोधरि सँ बाहर भय मुँह सँ पानि आनि चिताक आगि मिझाय अधजरू मांस इच्छापूर्ण खाय आखिरमे शेष धोधरिमे आनि रखलह। तकर हाड़ ओहि धोधरिमे एखनहुँ छैक। प्रशंसनीया शीलावती रानीके धोधरिमे लऽ जाय देखा कलहन्हि ।। 96-98 ।।

हे बहिनि! एही व्रतक भंगके कारण तूँ सन्तानहीन भेलीह तथा एही व्रतक पालन कयला सँ हम दीर्घायु सन्तति वाली तथा पतिसौभाग्य वाली भेलहुँ। एहि तरहे पूर्वजन्मक समाचार स्मरण करौला सँ रानी ओहि ठाम दीर्घ साँस लय शरीर छोड़ि देलन्हि। तखन शीलावती नाच गाना बाजा सहित स्वामि पुत्र आदि सँ सुशोभित अपना घर अयलीह। कर्पूरावतीक शरीर त्याग सुनि राजा मलयकेतु बहुत विलाप केलन्हि तथा मूर्छित भेलाह ।। 99-102 ।।

वृद्ध ब्राह्मणक वाक्य सँ राजा दुःख सँ उठि स्नान कय पत्नीके दाहदि क्रिया केलन्हि ।। 103 ।।

तथा रानीक प्रेम सँ श्रेष्ठ ब्राह्मण लोकिनके बहुत प्रकारक धन देलन्हि । तखन अपना मन्त्री सँ युक्त राज्यक चिन्ता केलन्हि ।। 104 ।।

इश्वर बजलाह-

एहू समय जे स्त्री विधिवत् जीमूतवाहनके उपवास सहित पूजतीह तथा कथा सुनि ब्राह्मणके दक्षिणा देतीह से एहि जन्ममे विवध सुखभोग कय जीवित पुत्रवाली अन्तमे विष्णुलोकमे वास कय सुखभागिनी हेतीह ।। 105-107।।

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